मुख्य पृष्ठ ~ हमारे बारे में ~ रसायन विज्ञान ~ संसाधन ~ डाउनलोड ~ अस्वीकरण ~ संपर्क ~ अद्यतन ~ शब्दावली

Index 1

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से

http://csttpublication.mhrd.gov.in/index.php

वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग

वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग (सीएसटीटी) हिन्दी और अन्य सभी भारतीय भाषाओं के वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दों को परिभाषित एवं नए शब्दों का विकास करता है। भारत की स्वतंत्रता के बाद वैज्ञानिक-तकनीकी शब्दावली के लिए शिक्षा मंत्रालय ने सन् १९५० में बोर्ड की स्थापना की। सन् १९५२ में बोर्ड के तत्त्वावधान में शब्दावली निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ। अन्तत: १९६० में केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय और 1961 ई. में वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग की स्थापना हुई। इस प्रकार विभिन्न अवसरों पर तैयार शब्दावली को 'पारिभाषिक शब्द संग्रह' शीर्षक से प्रकाशित किया गया, जिसका उद्देश्य एक ओर वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग के समन्वय कार्य के लिए आधार प्रदान करना था और दूसरी ओर अन्तरिम अवधि में लेखकों को नई संकल्पनाओं के लिए सर्वसम्मत पारिभाषिक शब्द प्रदान करना था।

स्वतंत्रता के बाद भारत के संविधान के निर्माताओं का ध्यान देश की सभी प्रमुख भाषाओं के विकास की ओर गया। संविधान में हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में मान्यता दी गई और केंद्रीय सरकार को यह दायित्व सौंपा गया कि वह हिंदी का विकास-प्रसार करें एवं उसे समृद्ध करे। तदनुसार भारत सरकार के केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने संविधान के अनुच्छेद 351 के अधीन हिंदी का विकास एवं समृद्धि की अनेक योजनाएँ आरंभ कीं। इन योजनाओं में हिंदी में तकनीकी शब्दावली के निर्माण का कार्यक्रम भी शामिल किया गया ताकी ज्ञान-विज्ञान की सभी शाखाओं में हिंदी के माध्यम से अध्ययन एवं अध्यापन हो सके। शब्दावली निर्माण कार्यक्रम को सही दिशा देने के लिए 1950 में शिक्षा सलाहकार की अध्यक्षता में वैज्ञानिक शब्दावली बोर्ड की स्थापना की गई।

पहले यह कार्य शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत हिंदी एकक द्वारा किया जाता था किन्तु बाद में विभिनन विषयों की हिंदी शब्दावली का निर्माण करने के दौरान यह ज्ञात हुआ कि यह काम बहुत ही अधिक विशाल, गहन और बहुआयामी है। इसके पूरे होने में बहुत सकय लगेगा और इस कार्य के लिए सभी विषयों के विशेषज्ञों एवं भाषाविदों की आवश्यकता होगी। अतः भारत सरकार ने 1 अक्तूबर, 1961 को प्रख्यात वैज्ञानिक डॉ॰ डी.एस. कोठारी की अध्यक्षता में वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग की स्थापना की ताकि शब्दावली निर्माण का कार्य सही एवं व्यापक परिप्रेक्ष्य में कार्यान्वित किया जा सके।

आयोग द्वारा शब्द-निर्माण की प्रक्रिया

शब्दावली आयोग में विभिन्न विषयों के एकक एवं अधिकारी हैं जो अपने-अपने विशिष्ट विषय की पाठ्य पुस्तकों, अद्यतन शब्दकोशों, विश्वकोशों एवं संदर्भ-ग्रंथों की सहायता से पर्यायों का चयन करते हैं। पर्यायों को अंतिम रूप देने के लिए आयोग के ये अधिकारी अपने-अपने विषयों/उपविषयों/विषय की शाखाओं के विशिष्ट विद्वानों, विश्वविद्यालय एवं उच्चतर तकनीकी संस्थानों के विशेषज्ञों आदि को परामर्श के लिए आमंत्रित करते हैं। इन विशेषज्ञों एवं अनुभवी भाषाविदों के परामर्श से ही प्रत्येक विषय के पर्याय को अंतिम रूप दिया जाता है ताकि आयोग द्वारा निर्मित शब्दावली को मानक स्वीकृति प्राप्त हो। इन शब्दावलियों पर समय-समय पर अनेक कार्यशालाओं, संगोष्ठियों एवं बैठकों में पुनिर्विचार भी किया जाता है और आवश्यकतानुसार संशोधन एवं परिवर्धन भी।

शब्दावली निर्माण के लिए स्वीकृत सिद्धान्त

आयोग द्वारा शब्दावली निर्माण के लिए स्वीकृत सिद्धांतों का सार इस प्रकार है:

(१) अंतरराष्ट्रीय शब्दों को यथासंभव उनके प्रचलित अंग्रेजी रूपों में ही अपनाना चाहिए तथा हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं की प्रकृति के अनुसार ही उनका लिप्यंतरण करना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय शब्दावली के अंतर्गत निम्नलिखित उदाहरण दिए जा सकते हैं : (क) तत्वElementों और यौगिकCompoundों के नाम, जैसे हाइड्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड आदि; (ख) तौल और माप की इकाइयाँ तथा भौतिक परिमाण की इकाइयाँ, जैसे डाइन, कैलरी, ऐम्पियर आदि; (ग) ऐसे शब्द जो व्यक्तियों के नाम पर बनाए गए हैं, जैसे मार्क्सवाद (कार्ल मार्क्स), ब्रेल (ब्रेल), बॉयकाट (कैप्टन बॉयकाट), गिलोटिन (डॉ॰ गिलोटिन), गेरीमैंडर (मिस्टर गेरी), एम्पियर (मिस्टर एम्पियर), फारेनहाइट तापक्रम (मिस्टर फारेनहाइट) आदि; (घ) वनस्पति-विज्ञान, प्राणि-विज्ञान, भूविज्ञान आदि की द्विपदी नामावली; (ङ) स्थिरांक, जैसे p, g आदि; (च) ऐसे अन्य शब्द जिनका आमतौर पर सारे संसार में व्यवहार हो रहा है, जैसे रेडियो, पेट्रोल, रेडार, इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, न्यूट्रॉन आदि; (छ) गणित और विज्ञान की अन्य शाखाओं के संख्यांक, प्रतीक, चिह्न और सूत्र, जैसे साइन, कोसाइन, टेन्जेन्ट, लॉग आदि (गणितीय संक्रियाओं में प्रयुक्त अक्षर रोमन या ग्रीक वर्णमाला के होने चाहिए)। (२) प्रतीक, रोमन लिपि में अंतर्राष्ट्रीय रूप में ही रखे जाएँगे परंतु संक्षिप्त रूप देवनागरी और मानक रूपों से भी, विशेषतः साधारण तौल और माप में लिखे जा सकते हैं, जैसे सेन्टीमीटर का प्रतीक c.m. हिंदी में भी ऐसे ही प्रयुक्त होगा परंतु देवनागरी में संक्षिप्त रूप से.मी. भी हो सकता है। यह सिद्धांत बाल-साहित्य और लोकप्रिय पुस्तकों में अपनाया जाएगा, परंतु विज्ञान और प्रौद्योगिकी की मानक पुस्तकों में केवल अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक, जैसे cm ही प्रयुक्त करना चाहिए। (३) ज्यामितीय आकृतियों में भारतीय लिपियों के अक्षर प्रयुक्त किए जा सकते हैं, जैसे क, ख, ग, या अ, ब, स परंतु त्रिकोणमितीय फलनों में केवल रोमन अथवा ग्रीक अक्षर प्रयुक्त करने चाहिए, जैसे साइन x, कॉस y आदि। (४) संकल्पनाओं (कांसेप्ट) को व्यक्त करने वाले शब्दों का सामान्यतः अनुवाद किया जाना चाहिए। (५) हिंदी पर्यायों का चुनाव करते समय सरलता, अर्थ की परिशुद्धता और सुबोधता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। सुधार-विरोधी प्रवृत्तियों से बचना चाहिए। (६) सभी भारतीय भाषाओं के शब्दों में यथासंभव अधिकाधिक एकरूपता लाना ही इसका उद्देश्य होना चाहिए और इसके लिए ऐसे शब्द अपनाने चाहिए जो - (क) अधिक से अधिक प्रादेशिक भाषाओं में प्रयुक्त होते हों, और (ख) संस्कृत धातुओं पर आधारित हों। (७) ऐसे देशी शब्द जो सामान्य प्रयोग के पारिभाषिक शब्दों के स्थान पर हमारी भाषाओं में प्रचलित हो गए हैं, जैसे telegraph/telegram के लिए तार, continent के लिए महाद्वीप, post के लिए डाक आदि इसी रूप में व्यवहार में लाए जाने चाहिए। (८) अंग्रेजी, पुर्तगाली, फ्रांसीसी आदि भाषाओं के ऐसे विदेशी शब्द जो भारतीय भाषाओं में प्रचलित हो गए हैं, जैसे टिकट, सिगनल, पेंशन, पुलिस, ब्यूरो, रेस्तरां, डीलक्स, आदि इसी रूप में अपनाए जाने चाहिए। (९) अंतर्राष्ट्रीय शब्दों का देवनागरी लिपि में लिप्यन्तरण : अंग्रेजी शब्दों का लिप्यंतरण इतना जटिल नहीं होना चाहिए कि उसके कारण वर्तमान देवनागरी वर्णों में नए चिह्न व प्रतीक शामिल करने की आवश्यकता पड़े। शब्दों का देवनागरी लिपि में लिप्यंतरण अंग्रेजी उच्चारण के अधिकाधिक अनुरूप होना चाहिए और उनमें ऐसे परिवर्तन किए जाएं जो भारत के शिक्षित वर्ग में प्रचलित हों। (१०) लिंग : हिंदी में अपनाए गए अंतर्राष्ट्रीय शब्दों को, अन्यथा कारण न होने पर, पुल्लिंग रूप में ही प्रयुक्त करना चाहिए। (११) संकरComplex शब्द : पारिभाषिक शब्दावली में संकर शब्द, जैसे guaranteed के लिए ‘गारंटित’, classical के लिए ‘क्लासिकी’, codifier के लिए ‘कोडकार’ आदि, के रूप सामान्य और प्राकृतिक भाषाशास्त्रीय प्रक्रिया के अनुसार बनाए गए हैं और ऐसे शब्दरूपों को पारिभाषिक शब्दावली की आवश्यकताओं, यथा सुबोधता, उपयोगिता और संक्षिप्तता का ध्यान रखते हुए व्यवहार में लाना चाहिए। (१२) पारिभाषिक शब्दों में संधि और समास : कठिन संधियों का यथासम्भव कम से कम प्रयोग करना चाहिए और संयुक्त शब्दों के लिए दो शब्दों के बीच हाइफन ( - ) लगा देना चाहिए। इससे नई शब्द-रचनाओं को सरलता और शीघ्रता से समझने में सहायता मिलेगी। जहाँ तक संस्कृत पर आधारित आदिवृद्धि का संबंधBond है, ‘व्यावहारिक’, ‘लाक्षणिक’ आदि प्रचलित संस्कृत तत्सम शब्दों में आदिवृद्धि का प्रयोग ही अपेक्षित है। परंतु नवनिर्मित शब्दों में इससे बचा जा सकता है। (१२) हलन्त : नए अपनाए हुए शब्दों में आवश्यकतानुसार हलन्त का प्रयोग करके उन्हें सही रूप में लिखना चाहिए। (१४) पंचम वर्ण का प्रयोग : पंचम वर्ण के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग करना चाहिए परन्तु lens, patent आदि शब्दों का लिप्यंतरण लेंस, पेटेंट/पेटेण्ट न करके लेन्स, पेटेन्ट ही करना चाहिए।


Copyright © 2007 - 2019 सर्वाधिकार सुरक्षित. Dr. K. Singh | Organic Synthesis Insight.