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दहन

En: Combustion किसी जलने वाले पदार्थ के वायु या आक्सीकारक द्वारा जल जाने की क्रिया को दहनCombustion या जलना (Combustion) कहते हैं। दहन एक ऊष्माक्षेपीExothermic अभिक्रिया (exothermic reaction) है। इस क्रिया में आँखों से ज्वाला दिख भी सकती है और नहीं भी। इस प्रक्रिया में ऊष्माHeat तथा अन्य विद्युतचुम्बकीय विकिरणRadiation (जैसे प्रकाश) भी उत्पन्न होते हैं।

मध्यकालीन युग तक लोग अग्नि को एक तत्वElement मानते रहे। रॉबर्ट बॉयल (Robert Boyle) तथा रॉबर्ट हुक (Robert Hook) ने यह दिखलाया कि यदि किसी बरतन में से हवा निकाल दी जाए तो उसमें गंधकSulphur या कोयला नहीं जलेगा और यदि उसमें पुन: हवा प्रविष्ट कर दी जाए तो वह फिर जल उठेगा। उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि शोरे (saltpetre) के साथ किसी पदार्थ का मिश्रणMixture शून्य स्थान में भी प्रज्वलित हो जाता है, जिससे यह पता लगता है कि हवा तथा शोरे दोनों में कोई ऐसा पदार्थ है जिसके कारण ज्वलन की क्रिया होती है। बाद में यह भी पता चला कि हवा में किसी पदार्थ के जलने से हवा के आयतन में कमी हो जाती है तथा बची हुई हवा निष्क्रियPassive होती है, जिसमें दहन संभव नहीं है। यह भी मालूम हुआ कि बंद स्थान में जीवधारियों की श्वासक्रिया से भी वही परिणाम मिलता है। अत: श्वासक्रिया तथा दहन समान क्रियाएँ हैं।

स्टाल (G.E. Stahl) ने 18वीं शताब्दी के प्रारंभ में फ्लाजिस्टन सिद्धांत का प्रतिपादन किया, परंतु उसने बॉयल द्वारा ज्ञात तथ्यFactों की ओर ध्यान नहीं दिया। उसने यह बतलाया कि प्रत्येक दाह्य पदार्थ दो प्रमुख अवयवों से बना होता है। एक फ्लोजिस्टन, जो दहन क्रिया होने पर निकल जाता है तथा दूसरा राख (calx), जो बाद में बच रहती है। यह विचारधारा 1774 ई. तक प्रचलित रही। 1775 ई. में प्रीस्टले (Priestley) तथा शेले (Scheele) ने एक गैस का पता लगाया, जिसका नाम बाद में लाब्वाज़्ये (Lavoisier) ने ऑक्सीजन रखा। सन् 1783 में लाब्वाज़्ये ने सुझाव रखा कि हवा का सक्रिय भाग ऑक्सीजन है, दहन में इसी की आवश्यकता पड़ती है और बिना इसके दहन संभव नहीं है। उसने यह भी बतलाया कि दाह्य पदार्थों के साथ जलते समय ऑक्सीजन रासायनिक संयोग करता है।

लकड़ी तथा कोयले के जलने में सबसे पहले उनमें से वाष्पVapourशील पदार्थ निकलते हैं, जिनमें कुछ गैसों का मिश्रण होता है। इसके बाद बचा हुआ कोयला ऑक्सीजन की सहायता से जलता है और इसकी दहन गति सतह पर ऑक्सीजन के पहुँचने पर निर्भर है। अपूर्ण दहन होने पर कार्बन मोनोक्साइड नामक एक विषैली गैस बनती है। साधारणतया ईंधन के ऊपरी भाग का पर्याप्त आक्सीजन प्राप्त हो जाने से वह जलकर कार्बन डाइक्साइड बनता है, पर यदि हवा निकलने का ठीक प्रबंधBond नहीं है तो यह कमरों में इकट्ठा होती रहती है और स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक होती है।

यदि दहनशील पदार्थ अधिक मात्रा में एकत्रित किए जाएँ तो कभी कभी उनमें स्वत: दहन हो जाता है। उनमें मंद ऑक्सीकरण होता है। इससे निकलती उष्मा इतनी अधिक होती है कि उनका ताप बढ़ जाता है, जिससे वे जलने लगते हैं। मृदुकोकCoke (soft coke) के छोटे टुकड़ों में स्वत: दहन की संभावना अधिक रहती है, अत: उनको गीला करके सुरक्षित रखा जाता है। द्रव ईंधन वाष्पीकृत होने पर ही हवा या ऑक्सीजन के साथ मिश्रण बनने पर जलते हैं।

गैसीय ईंधनों का दहन

इससे प्रदर्शित होता है कि सतत दहन के लिए वायु (आक्सीजन) आवश्यक है। गैसों के अणुMolecule गतिशील होते हैं और एक दूसरे से टकराते रहते हैं। निम्न ताप पर इसका अधिक प्रभाव नहीं पड़ता, परंतु ऊँचे ताप पर टकराने से पर्याप्त ऊर्जाEnergy उत्पन्न होती है, जिससे रासायनिक क्रियाएँ संपन्न हो सकती है। ईंधन और ऑक्सीजन के बीच की दहन क्रिया पहले सरल समझी जाती थी, पर अब सिद्ध हो गया है कि ये जटिल शृंखंलाबद्ध क्रियाएँ हैं। अधिक ऊर्जावाले अणुओं की टक्कर से परमाणुAtom या मुक्तमूलकRadical बनते हैं। ये मंद शृंखलाक्रियाएँ या तीव्र शृंखला-क्रियाएँ उत्पन्न कर सकते हैं।


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